Wednesday, December 11, 2013

Chakras of body

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सहस्रार को आमतौर पर शुद्ध चेतना का चक्र माना जाता है. हो सकता है इसकी भूमिका कुछ हद तक पीयूष ग्रंथि ग्रंथि जैसी हो, जो तमाम अंत:स्रावी प्रणाली के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए एमैन्युल हार्मोन स्रावित करती है और साथ में अध:श्चेतक के जरिए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से भी जुड़ती है. माना जाता है कि चेतक का चेतना के दैहिक आधार में मुख्य भूमिका होती है. इसका प्रतीक कमल की एक हजार पंखुडि़यां हैं और यह सिर के शीर्ष पर अवस्थित होता है. सहस्रार बैंगनी रंग का प्रतिनिधित्व करती है और यह आतंरिक बुद्धि और दैहिक मृत्यु से जुड़ी होती है. सहस्रार का आतंरिक स्वरूप कर्म के निर्मोचन से, दैहिक क्रिया ध्यान से, मानसिक क्रिया सार्वभौमिक चेतना और एकता से, और भावनात्मक क्रिया अस्तित्व से जुड़ा होता है.[26]

आज्ञा: ललाट चक्र

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आज्ञा (बिंदु के साथ भी, तृतीय नेत्र चक्र के रूप में भी जानी जाती है) चीटीदार ग्रंथि से जुड़ी होती है, जो अपनी अंतर्दृष्टि के मॉडल की सूचना दे सकती है. चीटीदार ग्रंथि रोशनी के प्रति संवेदी ग्रंथि होती है जो मेलाटोनिन हर्मोन का निर्माण करती है जो सोने या जागने की क्रिया को नियंत्रित करती है। आज्ञा का प्रतीक दो पंखुडि़यों वाला कमल है और यह श्वेत, नील या गहरे नीले रंग से मेल खाता है. आज्ञा का मुख्य विषय उच्च और निम्न अहम को संतुलित करना और अंतरस्थ मार्गदर्शन पर विश्वास करना है. आज्ञा का निहित भाव अंतर्ज्ञान को उपयोग में लाना है. मानसिक रूप से, आज्ञा दृश्य चेतना के साथ जुड़ा होता है. भावनात्मक रूप से, आज्ञा शुद्धता के साथ सहज ज्ञान के स्तर से जुड़ा होता है.[27]

(नोट: कुछ का यह मत कि सिर और ललाट चक्रों के साथ उनके संबंध का चीटीदार और पीयूष ग्रंथि से आदान-प्रदान होना चाहिए, कुंडलिनी पर आर्थर एवॉलोन की पुस्तक सर्पेंट पावर या अनुभवजन्य शोध) में दिया गया विवरण इसका आधार है.)

विशुद्ध: कंठ चक्र

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विशुद्ध (विशुद्धि भी) को अभिव्यक्ति के माध्यम से संप्रेषण और विकास के साथ जोड़कर समझा जा सकता है. यह चक्र गलग्रंथि, जो गले में होता है, के समानांतर है, और थायरॉयड हारमोन उत्पन्न करता है जिससे विकास और परिपक्वता आती है. इसका प्रतीक सोलह पंखुड़ियों वाला कमल है. विशुद्ध की पहचान हल्के या पीलापन लिये हुए नीले या फिरोजी रंग है. यह आत्माभिव्यक्ति और संप्रेषण जैसे विषयों, जैसा कि ऊपर चर्चा की गयी हैँ, को नियंत्रित करता है. शारीरिक रूप से विशुद्ध संप्रेषण, भावनात्मक रूप से स्वतंत्रता, मानसिक रूप से उन्मुक्त विचार और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है.[28]

अनाहत: ह्रदय चक्र

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अनाहत, या अनाहतपुरी, या पद्म-सुंदर बाल्यग्रंथि से संबंधित है, यह सीने में स्थित होता है. बाल्यग्रंथि प्रतिरक्षा प्रणाली का तत्व है, इसके साथ ही यह अंत:स्त्रावी तंत्र का भी हिस्सा है. यहां टी कोशिकाएं परिपक्वता को प्राप्त होती हैं जो कि बीमारी से और हो सकता है तनाव के प्रतिकूल प्रभाव से भी बचाव का काम करती हैं. अनाहत का प्रतीक बारह पंखुड़ियों का एक कमल है. (heartmind भी देखें) अनाहत हरे या गुलाबी रंग से संबंधित है. अनाहत से जुड़े मुख्य विषय जटिल भावनाएं, करुणा, सहृदयता, समर्पित प्रेम, संतुलन, अस्वीकृति और कल्याण है. शारीरिक रूप से अनाहत संचालन को नियंत्रित करता है, भावनात्मक रूप से अपने और दूसरों के लिए समर्पित प्रेम, मनासिक रूप से आवेश, और आध्यात्मिक रूप से समर्पण को नियंत्रित करता है.[29]

मणिपूर: सौर स्नायुजाल चक्र

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मणिपुर या मणिपुरक चयापचय और पाचन तंत्र से संबंधित है. माना जाता है कि मणिपुर लैंगरहैंस की द्वीपिकाओं से मेल खाता है,[30] जो कि अग्नाश्य में और साथ ही बाह्य अधिवृक्क ग्रंथियों और अधिवृक्क प्रांतस्था में कोशिकाओं का एक समूह है. ये पाचन में, शरीर के लिए खाद्य पदार्थों को ऊर्जा में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं. इसका प्रतीक दस पंखुड़ियों वाला एक कमल है. मणिपूर से मेल खाता रंग पीला है. मुख्य विषय जो मणिपूर द्वारा नियंत्रित होते हैं, ये विषय है निजी बल, भय, व्यग्रता, मत निर्माण, अंतर्मुखता, और सहज या मौलिक से लेकर जटिल भावना तक के परिवर्तन. शारीरिक रूप से मणिपूर पाचन, मानसिक रूप से निजी बल, भावनात्मक रूप से व्यापकता, और आध्यात्मिक रूप से सभी उपादानों के विकास को नियंत्रित करता है.[31]

स्वाधिष्ठान: त्रिक चक्र

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स्वाधिष्ठान, स्वाधिष्ठान या अधिष्ठान त्रिकास्थि (इसी अनुरूप नाम दिया गया) में अवस्थित होता है और अंडकोष या अंडाश्य के परस्पर के मेल से विभिन्न तरह का यौन अंत:स्राव उत्पन्न होता है जो प्रजनन चक्र से जुड़ा होता है. स्वाधिष्ठान को आमतौर पर मूत्र तंत्र और अधिवृक्क से संबंधित भी माना जाता है. त्रिक चक्र का प्रतीक छह पंखुडि़यों और उससे परस्पर जुदा नारंगी रंग का एक कमल है. स्वाधिष्ठान का मुख्य विषय संबंध, हिंसा, व्यसनों, मौलिक भावनात्मक आवश्यकताएं और सुख है. शारीरिक रूप से स्वाधिष्ठान प्रजनन, मा‍नसिक रूप से रचनात्मकता, भावनात्मक रूप से खुशी और आध्यात्मिक रूप से उत्सुकता को नियंत्रित करता है.[32]

मूलाधार: आधार चक्र

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मूलाधार या मूल चक्र प्रवृत्ति, सुरक्षा, अस्तित्व और मानव की मौलिक क्षमता से संबंधित है. यह केंद्र गुप्तांग और गुदा के बीच अवस्थित होता है. हालांकि यहां कोई अंत:स्रावी अंग नहीं होता, कहा जाता है कि यह जनेनद्रिय और अधिवृक्क मज्जा से जुड़ा होता है और अस्तित्व जब खतरे में होता है तो मरने या मारने का दायित्व इसी का होता है. इस क्षेत्र में एक मांसपेशी होती है जो यौन क्रिया में स्खलन को नियंत्रित करती है. शुक्राणु और डिंब के बीच एक समानांतर रूपरेखा होती है जहां जनन संहिता और कुंडलिनी कुंडली बना कर रहता है. मूलाधार का प्रतीक लाल रंग और चार पंखुडि़यों वाला कमल है. इसका मुख्य विषय काम—वासना, लालसा और सनक में निहित है. शारीरिक रूप से मूलाधार काम-वासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है[33]

वुडरूफ ने अपने अन्य भारतीय सूत्र स्रोतों में 7 चक्रों (अजन और सहस्रार समेत) का उल्लेख किया है. सबसे नीचे से सबसे ऊपर तक ये इस प्रकार हैं: तालू/तलना/लालना, अजन, मानस, सोम, ब्रह्मरांध्र, श्री (सहस्रार में) सहस्रार.

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